मोहन महतो कोईरी,पुस १५ गते ।
राइत इजोरिया चमचम करै,चान नुका रहल है ।
सोझा बैसल सजनी हम्मर नजैर झुका रहल है ।
शुभकामना

मदहोस कहु,बेहोस कहु या जे कहु,अहाँक मर्जी
मुस्की मारैत ठोर अप्पन चेहरा छुपा रहल है ।
लागल आइग करेजा के पुछु नै कि-कि करै है ?
अप्पन प्रेमक सागर मे हमरो डुबा रहल है ।
स्नेहक डोर सऽ बन्हैत ओ जतेबे करिब अबैछै ।
जीवनमे नव आसक दीप,डिबिया जरा रहल है ।
कोसोक दुरी खतम भेल है जेना बुझाइय”मोहन”
प्रसन्न भेल ई मोन हमर कि-कि लुटा रहल है ।














